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छत्तीसगढ़

जर्जर भवन, बदहाल शौचालय और ‘गुरुजी’ का इंतजार—छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था का काला सच

जर्जर भवन, बदहाल शौचालय और ‘गुरुजी’ का इंतजार—छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था का काला सच

छत्तीसगढ़ – छत्तीसगढ़ में सत्ता की कुर्सी बदली, चेहरे बदले और ‘सुशासन’ के बड़े-बड़े होर्डिंग्स भी सड़कों पर तन गए। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ‘महतारी वंदन’ और ‘विकसित छत्तीसगढ़’ के नारों से हवा बांध रही है, लेकिन राज्य के लगभग 45,000 से अधिक सरकारी स्कूलों की सिसकती हकीकत इन नारों को मुँह चिढ़ा रही है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जी, क्या आप अपने परिवार के किसी बच्चे को उन स्कूलों में भेज सकते हैं जहाँ न छत सलामत है, न पीने का पानी है और न ही शौचालय में दरवाजा? अगर नहीं, तो प्रदेश के लाखों गरीब बच्चों के भविष्य के साथ यह ‘खिलवाड़’ क्यों?

1. जर्जर भवन: मौत के साये में ‘अक्षर ज्ञान’
प्रदेश के लगभग 70% ग्रामीण स्कूलों की हालत किसी खंडहर से कम नहीं है। 8,000 से अधिक स्कूल भवन ‘अति-जर्जर’ घोषित हैं, लेकिन वहां आज भी मासूमों की क्लास लगती है।
बाउंड्री वॉल का अकाल: आधे से ज्यादा स्कूलों में सुरक्षा घेरा (Boundary Wall) नहीं है। स्कूल परिसर अब पढ़ाई के केंद्र नहीं, बल्कि आवारा मवेशियों का तबेला और असामाजिक तत्वों का अड्डा बन चुके हैं। क्या मुख्यमंत्री जी बताएंगे कि बिना सुरक्षा के बच्चे स्कूल में सुरक्षित कैसे हैं?

2. शिक्षक विहीन स्कूल: ‘राम भरोसे’ छत्तीसगढ़ की शिक्षा
दावा किया जाता है कि छत्तीसगढ़ ‘एजुकेशन हब’ बन रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि हजारों स्कूलों में ‘शिक्षक’ ही नहीं हैं।
कई प्राथमिक स्कूल केवल एक ‘शिक्षादूत’ या एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। जब गुरु ही नहीं होगा, तो ज्ञान की गंगा कैसे बहेगी?

3. शौचालय की ‘बदबू’: स्वच्छता के दावों की पोल
सबसे शर्मनाक स्थिति स्कूलों के लैट्रिन-बाथरूम की है। ‘स्वच्छ भारत’ का नारा देने वाली सरकार के राज में:
स्कूलों के शौचालय में दरवाजे तक नहीं हैं।
पानी की एक बूंद मयस्सर नहीं है, जिससे गंदगी का अंबार लगा रहता है।
बेटियों का दर्द: शौचालयों की इस दुर्गति के कारण मिडिल स्कूल तक आते-आते लड़कियां स्कूल छोड़ रही हैं। मुख्यमंत्री जी, क्या यह वही ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का मॉडल है?

4. बजट की चमक बनाम जमीनी अंधेरा
सरकार ने बजट 2026 में शिक्षा के लिए ₹22,000 करोड़ से ज्यादा का प्रावधान किया है। सवाल यह है कि यह पैसा जा कहाँ रहा है?
स्वामी आत्मानंद और पीएम श्री जैसे चंद ‘शो-पीस’ स्कूलों को चमकाने के चक्कर में उन हजारों सामान्य स्कूलों की बलि दी जा रही है, जहां प्रदेश का गरीब और आदिवासी बच्चा पढ़ता है।

छत्तीसगढ़ का भविष्य केवल फाइलों और आंकड़ों में नहीं सुधरेगा। जब तक गांवों के प्राथमिक स्कूलों की दीवारें मजबूत नहीं होंगी, तब तक ‘विकसित छत्तीसगढ़’ का सपना केवल एक कागजी महल ही रहेगा।

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